जिक्र क्या, जुबां पर नाम तक नहीं,
इससे बड़ा कोई इंतकाम नहीं।
कभी जिसकी आहट से साँसें महकती थीं,
आज उसकी यादों का भी कोई मुकाम नहीं।
दिल ने लाख चाहा उसे बदनाम कर दूँ,
मगर इश्क़ की रीत में ऐसा कोई काम नहीं।
ज़ख्म इतने मिले कि दर्द भी थक गया,
अब आँखों में आँसुओं का भी इंतज़ाम नहीं।
वो अपने नए सफ़र में आबाद होगा,
और मेरे हिस्से बस ख़ामोशियों की शाम सही।
मैंने हर शिकायत को दफ़्न कर दिया,
अब किसी से कोई सवाल, कोई इल्ज़ाम नहीं।
जिसे भुलाने की दुआ हर रोज़ की थी,
आज उसका नाम लेना भी मेरे काम नहीं।
अब अगर कभी राहों में सामना हो भी जाए,
न नज़र उठेगी, न कोई सलाम होगा।
क्योंकि जिक्र क्या, जुबां पर नाम तक नहीं—
इससे बड़ा कोई इंतकाम नहीं।