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वसीयत मेरी

vikas bajpai

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दीद जिनकी बन गयी अब शिफ़ा मेरी।
        
                                                    
                            
वो पूँछने भी नहीं आया है तबीयत मेरी।

बस यही बात है जो मुझको खाये जाती है।
उनको मालूम नहीं क्या है अज़ीयत मेरी।

ज़िन्दगी भर तो किसी ज़ख्म के मरहम न बने।
अब क्यूँ रोते हो भला पढ़ के वसीयत मेरी।
- विकास कालाआमी
2 महीने पहले
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