ज्ञान चक्षु सा नगर,
पलकों में समेटे विश्व
चांद सी शीतलता,
खुशबुओं का खेत,
बंजर मस्तिष्क पर ज्ञान की कोपले फूटे।
छिटके ज्ञान का प्रकाश,
हिंसा की आग में,
जिंदा शहर जल रहा है,
हूं हूं कर खतरे की घंटी बज रही है,
केसरिया लपटों में छात्रों के सपने जल रहे हैं,
स्याह धुआं से नैनो की ज्योति बुझ रही है।
मौत का तांडव हो रहा है,
मरघट सा नगर नजर आ रहा है,
अघोरी मृत होते नगर पर नजरें गड़ाए बैठे हैं,
ज्ञान चक्षु सा नगर,
सपनों की डगर,
दहशत का दस्तावेज ऐसा छपा,
छात्राएं नैनों में नीर भर,
लिपट सिसक रोए जा रही हैं,
कहे जा रही है,
जान बची तो लाखों पाए,
लौट के बुद्धू घर को आए।
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