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एक ही पुकार है मेरी

Vijay Prabhakar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक ही पुकार है मेरी, सुन ले हे प्रभु, एक ही पुकार।
        
                                                    
                            
कभी भी सूक्ष्म-सा प्रमाद मुझ पर छाने न पाए भार॥

जहाँ स्वार्थ की धुंध नेत्रों में विलुप्त हो जाए,
वहाँ शीघ्र-अंजन-सा दृष्टि मेरे नेत्रों में भर दे।

और जब मोह की जंजीर मन को बाँधे कहीं,
तो प्रवचन की नाव से मुझे पार लगा दे॥

जिस सुख ने पराये दुःख की आंच पर पकर मुस्कुराहट बिखेरी,
जब कभी वह मुखमंडप मुझ पर टूट पड़े,
मेरे हृदय से उस दुःख की अनगिनत प्रतिध्वनि उठा दे॥

एकाएक पांव तले चोट दे कर मुझे सचेत कर दे,
अभिमान की ओट से उन्माद अंधकार चीर दे।
जब सफलता के शिखर पर नशा चढ़ आये,
तो भ्रम की परत हटाकर मुझे धरातल तक लौटा दे॥

विलासिता की गर्त में फिसलूँ या मुक्ति की लालिमा में बँधूँ,
मेरे आत्मसुख पर आग लगा, धुँआ-सा कर दे,
कि विषाद की चादर जगे—रहे अनवरत ताजगी॥

यदि मेरी आस्था क्षीण हो जाए कभी,
तो पगों तले धरती को चूर्ण-सा कुचल दे,
विकलित प्राणों की अंतर्नाद गुंजायमान कर दे॥

इस जगत् के रंगमंच पर भी मुझे पंख फैलाने दे,
दयामयी कविपति! अपनी रीति-नीति में मुझ पर अपवाद कर दे॥

पापोत्पन्न यह शाप मुझे दे, हे पिता! सन्मार्ग दिखा दे,
तू जानता है, प्रभु! तेरे दरबार में यही दंड भी अनुग्रह है॥

बा भ बोरकर
हिंदी अनुवाद _ विजय नगरकर
2 महीने पहले
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