ज़ख्मे दिल
जख्मे दिल अब नासूर बन गए
थक गए हैं मरहम लगाते लगाते।
ये धरती ये अंबर ये सौंधी फिजाएं
थक गए हैं सबको बचाते बचाते।
यह नूर जिंदगी का अब ढल सा गया है
थक गए हैं कसमे निभाते निभाते।
कुछ अनसुलझी पहेली बन गई है जिंदगी
अब थक गए हैं इसको सुलझाते सुलझाते।
जख्मे दिल अब नासूर बन गए हैं
थक गए हैं कसमें निभाते निभाते।
मोहब्बत ये तेरी कैसी है मुझसे
अकेली ही चली हूं हर रास्ते पे।
ठोकर खाकर खुद खड़ी हूं
तू दूर बैठे मुस्कुराता रहा है।
जख्मी दिल अब नासूर बन गए हैं
थक गए हैं मरहम लगाते लगाते।
-विजय लक्ष्मी