हरि हर हरि हर नाम अनूप,
एक ही रूप, अद्वैत स्वरूप।
पीताम्बर धारी बंसी संग रिझाए,
जटाधारी डमरू की लय से बाँधे।
एक पूर्ण चंद्रमा-सा मन को मोहे,
दूजे के मस्तक अर्धचंद्र सोहे।
कृष्ण पुकारें या शिव ध्याएँ,
हरि में हर , हर में हरि को पाएँ।
हरि हर हरि हर नाम अनूप,
एक ही रूप, अद्वैत स्वरूप।
गंगा हरि के चरण पखारे,
शिव की जटाओं संग लहराए।
एक शेष शय्या पर विराजे,
दूजा कंठ का हार बनाए।
कृष्ण पुकारें या शिव ध्याएँ,
हरि में हर , हर में हरि को पाएँ।
हरि हर हरि हर नाम अनूप,
एक ही रूप, अद्वैत स्वरूप।
-वन्दना सूद