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अपराध

Vidhan bhiyana

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            यह कितना अश्लील होगा,
        
                                                    
                            
आग लगी घर में फिर भी
तुम खोए रहे अंतर्मन में।
कैसे धैर्य रख सके तुम
इस दुनिया के शोर से
आंदोलन की पृष्ठभूमि में भी
खोए रहे मन के दौड़ में।
खैर छोड़ो,
क्या दिल में नहीं आया संशय तुम्हारे मन में भी
न्याय करेगा अंतिम वो एक दिन, पूछेगा प्रश्न अनेक
कि आग लगी थी घर में फिर भी
क्यों खोए थे अंतर मन में?
थोड़ा सा काम करते, आग बुझाने का नाम ही करते
हृदय तुम्हारा झंझोर न उठा, जल रहे था परिवार
इन आग की लपटों में फिर भी खोए रहे अंतर्मन के सपनों में
इस आंदोलन के दौर में साथ तुम्हें देना था
महापुरुषों के योगदान को आगे तुमको बढ़ाना था
राष्ट्र की भूमि को पुनः पावन तुम्हे करना था
भ्रष्ट आचरणों का नाश तुम्हें करना था
इन दानवों का संहार तुम्हारा था दायित्व
इस देव भूमि का पुनः निर्माण तुम्हें करना था
फिर भी दायित्व को त्याग कर अपने अंतर्मन में
खोए रहे
बताओ आग लगी थी घर मै फिर भी अन्तर्मन में क्यों खोए रहे
तुम दलील दोगे
विचार था मेरा, यह मेरा ही विचार होगा
व्यक्तिवादी था मै यह मेरा ही अधिकार, होगा
निजता मेरी आजादी आजादी की ख्वाहिश थी
अंतर्मन में खोए रहना मेरे जीवन जीने की फरमाइश थी
कुपित होकर धर्मराज तुमको जब सजा सुनाएंगे ,

दंड मिलेगा तुमको केवल अंतर्मन में बसने का

हो सकता है अंतर्मन रहना तुम्हारा अधिकार हो

लेकिन आग लगी हो घर में फिर भी अंतर्मन में खोने पर धिक्कार है

वे सजा सुनाएंगे तुमको, पर जीवन के इस पन्ने में
देव भूमि में भी तुम को चैन नहीं आया जीने मै
तुमने जो कृत्य किया है ये कायरो की पहचान है

नरक के दरवाजे खुलते है जिओ अपने सपनों में

होंगे जब अत्याचार तुमपर तब तुम रोना मत

मांगोगे अपने अधिकार तुम्हारे, दंड मिलेगा तुमको जब

केवल अंतर्मन में सोए रहने का फल यही मिलेगा

निजता की ख्वाहिश भी एक स्वप्न लगेगा
जब भूख से तड़पने का तुमको हर दिन दंड मिलेगा

कोसोगे अपनी जिंदगी को, तब तुम्हे याद आएगा

 
3 महीने पहले
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