विज्ञापन

अपलक, अविचल, अनमनी सी

Versha Varshney

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अपलक, अविचल, अनमनी सी ,
        
                                                    
                            
आतुर मिलन को चपला घनी सी।
आहत, अनहत ,अदृश्य जैसे ,
विरहन हो कोई घायल हिरनी सी ।
नवयुग की लेकर धारणा दिल में,
फिरती द्वारे द्वारे वो अनमनी सी ।
आतुरता अलगाव का गहन अंधकार ,
गीत गाती दिखती यूँ शाम घनी सी ।
घायल, घनघोर घटा, बनाती आकृति,
घट जाती उमड़ घुमड़ कर चंचल बयार।
मदमस्त अलंकार का रूप लिए देखो ,
प्रकृति धरा को कितने रूप दिखाती ।
नवजीवन की आशा दिल में सजाकर ,
सजाकर सोलह शृंगार से ...खुद को
छलकाकर नैनों की अनमोल गगरिया,
यूँ प्रकृति हम सब पर उपकार लुटाती ।

-वर्षा वार्ष्णेय अलीगढ़
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। 
8 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Dn Chaubey

7573 कविताएं

View Profile