अपलक, अविचल, अनमनी सी ,
आतुर मिलन को चपला घनी सी।
आहत, अनहत ,अदृश्य जैसे ,
विरहन हो कोई घायल हिरनी सी ।
नवयुग की लेकर धारणा दिल में,
फिरती द्वारे द्वारे वो अनमनी सी ।
आतुरता अलगाव का गहन अंधकार ,
गीत गाती दिखती यूँ शाम घनी सी ।
घायल, घनघोर घटा, बनाती आकृति,
घट जाती उमड़ घुमड़ कर चंचल बयार।
मदमस्त अलंकार का रूप लिए देखो ,
प्रकृति धरा को कितने रूप दिखाती ।
नवजीवन की आशा दिल में सजाकर ,
सजाकर सोलह शृंगार से ...खुद को
छलकाकर नैनों की अनमोल गगरिया,
यूँ प्रकृति हम सब पर उपकार लुटाती ।
-वर्षा वार्ष्णेय अलीगढ़
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