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मनुष्य हूँ मैं

Veer Abhimanyu

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मनुष्य हूँ मैं...
        
                                                    
                            

मनुष्य को छाया ही खुद की,
क्या कहेगी देख लूँ मैं।
पथ है भरा दुःख से मगर,
चल रहा पथ पर सुखन,
जान लो मुझको ऐ राही मनुष्य हूँ मैं।

कहता नहीं जग में किसी से,
जिंदगी में क्या है उलझन,
रात्रि में वह ढूंढ लेता सूत्र की,
चुप-चाप सुलझन।
जान लो मुझको ऐ राही मनुष्य हूँ मैं।

जग भर में व्यापित है,
जो लीला प्रकृति की,
वास्तव में जिंदगी है,
पात्रता उसमें मनुज की।
हे सखे कुछ ध्यान भी दो,
प्रकृति का ही पुत्र हूँ मैं।
जान लो मुझको ऐ राही मनुष्य हूँ मैं।

देख कर यूँ आदमी,
हैवानियत पर शान जिसकी।
देख कर ऐसी तबाही,
मिटता नहीं संसय हमारा,
दिख रहे सारे मनुज ये मनुष्य ही हैं?
हे सखे खुद को तनिक पहचान लो अब,
परिचय तुम्हारा रात भर, लिखता रहूँ मैं?
जान लो मुझको ऐ राही मनुष्य हूँ मैं।

लड़ रहा दिन भर विचारों लड़ाई,
रात भर नींद को देता दुहाई।
ना जाने क्या कमी रह गई मनुज में,
जिंदगी भर ढूंढता है उस कमी को।
अन्त में तो सब धरा से मिट ही जाना है,
मनुज ने मिथ्या ही क्यों आंतक ठाना है।
तीव्रता तेरी मनुज क्या उचित है? देख लूँ मैं।
जान लो मुझको ऐ राही मनुष्य हूँ मैं।
- वीर अभिमन्यु


 
एक वर्ष पहले
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