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क्या इतना आसान है कवि होना ?

Ved Prakash

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आज जब मंचों पर
        
                                                    
                            
शब्दों से भ्रम रचा जा रहा है,
सोशल मीडिया की
भागती रीलों ने कविता को
चंद सेकंडों का खेल बना दिया है,
तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि
क्या इतना आसान है कवि होना ?

जहां संसद में भाषणों के बीच,
उधार की कुछ पंक्तियां पढ़कर
तालियां बटोर ली जाती हैं
जहां भावनाएं भी मात्र
प्रभाव छोड़ने का साधन बन जाती हैं,
क्या वहां सच में जन्म ले पाती है कविता ?

इस स्वार्थ-साधते समय में,
जहां हर रिश्ता
तराजू पर तौला जाता है
तब क्या इतना सहज है,
किसी अजनबी की पीड़ा को
अपनी पीड़ा बना लेना ?
हाशिए पर खड़े चेहरों की खामोशी,
उनके दर्द, उनके संघर्षों को
अपना बना लेना
क्या यह सब यूं ही संभव हो जाता है ?

जब आत्ममुग्धता
अपनी चरम सीमा पर हो
और संवेदनाएं भी चलन देखकर आकार लेती हों,
तब क्या इतना आसान है
अपनी आत्मा को अक्षुण्ण रखते हुए
एक सच्चा शब्द कागज़ पर उतार पाना ?
क्या सचमुच
इतना आसान है कवि होना ?

-- वेद प्रकाश तिवारी
3 महीने पहले
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