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राबड़ी और संतोष

Vandana Agrawal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इक इंसान थोड़ा परेशान
        
                                                    
                            
सड़क के किनारे इक दुकान पर
असमंजस में पड़ा कुछ सोच रहा
अपने विचारों के उधेड़बुन में फंसा
दुकान में रखे राबड़ी के
पतीले को देखकर हंसा
मन हुआ उसका खाने को
कहा उसने लाने को
हाथ में पकड़ राबड़ी के कुल्हड़ को
चाटने लगा वह इक-इक उंगली को
खाता वह हर बार ऐसे
मिला हो पहली बार जैसे
सारी भावनाएं, सारे उल्लास
सारे जीवन के उसके एहसास
सिमट उस राबड़ी के कुल्हड़ में
डूबा वह जिसे खाने में
अचानक ये क्या हुआ
मन उसका विचलित सा हुआ
लगा सोचने देने पड़ेगे इसके पैसे
मजदूरी कर मिले हो जैसे-तैसे
राबड़ी के खाने की खुशी
पैसे के जाने का गम
उसके मुख की भाव-भंगिमा को
बदलते नजर आते
कुछ देर तक यह चलता रहा
रेखाओं का बदलना चेहरे पर लगा रहा
अंत में वह मुस्कुराया
सहज उसने राबड़ी खाया
पैसे के बदले संतोष पाकर मुस्कुराया..
2 वर्ष पहले
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