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राबड़ी और संतोष

                
                                                         
                            इक इंसान थोड़ा परेशान
                                                                 
                            
सड़क के किनारे इक दुकान पर
असमंजस में पड़ा कुछ सोच रहा
अपने विचारों के उधेड़बुन में फंसा
दुकान में रखे राबड़ी के
पतीले को देखकर हंसा
मन हुआ उसका खाने को
कहा उसने लाने को
हाथ में पकड़ राबड़ी के कुल्हड़ को
चाटने लगा वह इक-इक उंगली को
खाता वह हर बार ऐसे
मिला हो पहली बार जैसे
सारी भावनाएं, सारे उल्लास
सारे जीवन के उसके एहसास
सिमट उस राबड़ी के कुल्हड़ में
डूबा वह जिसे खाने में
अचानक ये क्या हुआ
मन उसका विचलित सा हुआ
लगा सोचने देने पड़ेगे इसके पैसे
मजदूरी कर मिले हो जैसे-तैसे
राबड़ी के खाने की खुशी
पैसे के जाने का गम
उसके मुख की भाव-भंगिमा को
बदलते नजर आते
कुछ देर तक यह चलता रहा
रेखाओं का बदलना चेहरे पर लगा रहा
अंत में वह मुस्कुराया
सहज उसने राबड़ी खाया
पैसे के बदले संतोष पाकर मुस्कुराया..
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2 वर्ष पहले

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