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तरक्की की इमारतें

विमल कुमार

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक आदमी है
        
                                                    
                            
जो अपनी पीठ पर
पूरे शहर के कंक्रीट का बोझ ढोता है,
और शाम को फटी हुई चादर ओढ़कर
अंधेरे में सोता है।
और दूसरी तरफ...
कागजों के नक्शों पर
चमकते हुए बुलेट ट्रेन के ट्रैक बनते हैं,
जहाँ विकास के नाम पर
गरीबों के आशियाने काटे और छंठे जाते हैं।
मैं पूछता हूँ इस चमकदार तंत्र से—
जहाँ हर रोज़ संसद के भीतर
तरक्की के नए ढोल पीटे जाते हैं,
वहाँ फुटपाथ पर दम तोड़ते दम
क्यों किसी को नज़र नहीं आते हैं?
यहाँ रोटी का हक मांगना
जैसे कोई बड़ा गुनाह हो गया है,
और लोकतंत्र का मतलब
सिर्फ भाषणों का प्रवाह हो गया है।
साफ-साफ सुन लो—
यह जो तुम शहर के सीने पर
बड़ी-बड़ी इमारतें तान रहे हो,
यह कोई तरक्की नहीं,
यह तो सिर्फ
इंसानियत के कत्लगाह का नवीन निर्माण है!
जब तक इस देश का मेहनतकश
अपनी ही बनाई हुई दीवारों के बाहर खड़ा रहेगा,
तब तक तुम्हारा हर नया निर्माण
एक दिन ढहकर रहेगा!
-विमल 
एक घंटा पहले
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