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एक हद होती है

Vaibhav Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चलो अब ख़ामोशी को ही अपना आख़िरी लिबास बना लेते हैं,
        
                                                    
                            
जो बह रहे थे अश्क, उन्हें आँखों में ही सुखा लेते हैं,
पत्थर के इस शहर में शीशे जैसी साफ़ नीयत की,
दुहाई देने की भी एक हद होती है।

एक उम्र गुज़र गई बस दूसरों के साए में ढलते-चलते,
धूप चाहे जितनी भी कड़ी हो,
मोम की तरह पिघलते-पिघलते,
काले घने बादलों से सूखी और बंजर ज़मीन पर बारिश की,
उम्मीद रखने की भी एक हद होती है।

अब न कोई पुकारेगा हमें इस तन्हाई के समंदर में,
ना कोई उजाला झाँकेगा इस टूटे हुए दिल के अंदर में,
डूबती हुई कश्ती के पतवार को तूफ़ानों के सामने बार-बार,
सँभालने की भी एक हद होती है।

चलो आज इस रूह को मुकम्मल तौर पर आज़ाद कर दें,
जो ख़्वाब अधूरा रह गया, उसे शून्यता के नाम कर दें,
ज़िंदगी के इस लम्बे और थका देने वाले मुसाफ़िरखाने में,
ठहरने की भी एक हद होती है।

चलो अब हर आरज़ू को हवा के सुपुर्द कर देते हैं,
जो उम्मीदें जली थीं भीतर, उन्हें राख कर देते हैं,
बुझते हुए चिराग़ों से अंधेरी रातों को रौशन करने की,
नादानियों की भी एक हद होती है।

एक उम्र गुज़र गई बस ग़ैरों की महफ़िलों को सजाते हुए,
अपनी ही पलकों पर दर्द के अनगिनत मोती छुपाते हुए,
बेरहम वक़्त की कसौटी पर अपनी हर सच्ची वफ़ा को,
आजमाने की भी एक हद होती है।

अब न कोई फ़रियाद इन सूखे हुए होठों से निकलेगी,
ना कोई गुज़री याद इस पत्थर बन चुके दिल में पिघलेगी,
टूटे हुए शीशों में अपनी ही सूरत की परछाइयों को,
तलाशने की भी एक हद होती है।

चलो आज इस सफ़र की हर डोर को यहीं काट देते हैं,
जो अनकहा दर्द रह गया, उसे ख़ामोशी में बाँट देते हैं,
ज़िंदगी के इस तन्हा रास्ते पर थके हुए कदमों से,
चलते रहने की भी एक हद होती है।

 
2 महीने पहले
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