इंसान
एकदिन में नहीं खोता है।
पहले वह खौलता है,
फिर कम बोलता है।
अक्सर रहता है मौन,
भीड़ में रहता है गौण।
ऊपर ऊपर मुस्कुराता है,
अंदर अंदर रोता है।
इंसान
एकदिन में नहीं खोता है।।
आस पड़ोस से वह डरता है,
तिल तिल कर मरता है।
उम्मीदें हो जाती हैं कम,
अनवरत घिरे रहता है गम,
लाश बनकर खुद को ढोता है।
इंसान
एकदिन में नहीं खोता है।।
न चाहिए कोई सम्मान,
न कोई अभिमान।
न कोई लोभ ; न क्षोभ
न उसे आता है क्रोध,
न लेना चाहता प्रतिशोध।
वह अज़ीब शांति की बीज बोता है।
इंसान
एकदिन में नहीं खोता है।।
न को शिकायत ; न फरियाद
न आती है अपनों की याद।
फिर एकदिन आता है,
वह विदाई गीत गाता है।
फिर गहरी नींद में सो जाता है।
इंसान
एकदिन में नहीं खोता है।।