त्रिशंकु स्वर्ग की अधूरी चाह
सूर्यवंश का नृप त्रिशंकु,
धर्मपरायण कहलाता था।
राज्य, यश, वैभव पाकर भी,
मन में स्वर्ग बसाता था।
देह सहित स्वर्गारोहण का,
उसने दृढ़ संकल्प किया।
मृत्यु-द्वार को लाँघ स्वयं ही,
मन में देवलोक का स्वप्न लिया।
अति-अभिलाषा हठ बन बैठी,
तब विवेक भी भरमाया।
धर्म-विधान को लाँघ चला जो,
नभ-मध्य त्रिशंकु कहलाया॥
कुलगुरु वसिष्ठ के आश्रम में,
राजा विनय से आया था।
‘देह सहित स्वर्ग दिला दें,’
उसने शीश झुकाया था।
कुलगुरु बोले, ‘दैव-विधान में,
देह सहित कोई स्थान नहीं।
प्रकृति-नियम को हठ से बदलना,
धर्म-सम्मत कोई विधान नहीं।’
गुरु की सम्मति छोड़ नरेश ने,
फिर ऋषि-पुत्रों को समझाया।
धर्म-विधान को लाँघ चला जो,
नभ-मध्य त्रिशंकु कहलाया॥
वसिष्ठ-पुत्रों के सम्मुख उसने,
अपना आग्रह दोहराया था।
‘गुरु न मानें, तुम यज्ञ करो,’
उसने वचन सुनाया था।
गुरु-मर्यादा भंग हुई तो,
ऋषि-पुत्रों ने रोष जताया।
क्रोधाग्नि में शाप उच्चारा,
चांडाल का रूप दिलाया।
शापित होकर राजा ने फिर,
विश्वामित्र का द्वार अपनाया।
धर्म-विधान को लाँघ चला जो,
नभ-मध्य त्रिशंकु कहलाया॥
शरणागत की पीड़ा सुनकर,
ऋषिवर ने संकल्प किया।
अपने तप की शक्ति लगाकर,
स्वर्ग चढ़ाने का वचन दिया।
विश्वामित्र ने ऋषि बुलाकर,
विधिवत महायज्ञ रचाया था।
मंत्र जले, आहुति उठी पर,
कोई देव न आया था।
क्रुद्ध ऋषि ने तप के बल से,
त्रिशंकु स्वर्ग चढ़ाया।
धर्म-विधान को लाँघ चला जो,
नभ-मध्य त्रिशंकु कहलाया॥
देवलोक के द्वार पहुँचकर,
राजा हर्ष मनाता था।
किन्तु इंद्र का दिव्य विधान,
उसका मार्ग रुकाता था।
‘देह सहित प्रवेश न होगा,’
इंद्रदेव ने रोक दिया।
स्वर्ग-द्वार से नीचे फेंका,
पुण्य-पंथ से मोड़ दिया।
गिरते-गिरते नृप ने भय से,
विश्वामित्र को बुलाया।
धर्म-विधान को लाँघ चला जो,
नभ-मध्य त्रिशंकु कहलाया॥
‘तिष्ठ त्रिशंकु!’ ऋषिवर बोले,
राजा बीच ठहरता गया।
सिर नीचे और चरण ऊपर,
नभ में वहीं अटकता गया।
भूलोक उसको खींच रहा था,
स्वर्ग न उसको लेता था।
दैव-विधान और तपोबल में,
जीवन पीड़ा सहता था।
विश्वामित्र के तप ने उसको,
अधर गगन में ठहराया।
धर्म-विधान को लाँघ चला जो,
नभ-मध्य त्रिशंकु कहलाया॥
विश्वामित्र का रोष बढ़ा तो,
नव नक्षत्र रच डाले थे।
दक्षिण दिशा के सूने नभ में,
नव आलोक जगा डाले थे।
नया इंद्र रचने को ऋषिवर,
तपोयोग में आए थे।
देवगणों ने विनय सुनाकर,
सृष्टि-नियम बचाए थे।
देव-सहमति से नूतन नभ में,
त्रिशंकु-लोक बसाया।
धर्म-विधान को लाँघ चला जो,
नभ-मध्य त्रिशंकु कहलाया॥
सदियाँ बीतीं, नाम त्रिशंकु,
अधर-दशा समझाता है।
दो दिशाओं के बीच रुका मन,
अपना मूल गँवाता है।
एक किनारा छूट चुका पर,
दूजा हाथ न आता है।
आधी आशा, आधी मंज़िल,
मन को बहुत सताता है।
जड़ से कटकर ऊँचा उठना,
किसको पूर्ण बना पाया?
धर्म-विधान को लाँघ चला जो,
नभ-मध्य त्रिशंकु कहलाया॥
पद, प्रतिष्ठा, शीघ्र सफलता,
सब पाने की चाह रहे।
पर साधन और मर्यादा का,
मन में पूरा ध्यान रहे।
ऊँचे सपने दोष नहीं हैं,
पाँव धरा पर रहने दो।
नव आकाश छुओ लेकिन,
जड़ से रिश्ते रहने दो।
जो उपलब्धि मूल बचा लेती,
उसने सच्चा मान कमाया।
धर्म-विधान को लाँघ चला जो,
नभ-मध्य त्रिशंकु कहलाया॥
गुरु-वचन और धर्म-नियम का,
जीवन भर सम्मान रहे।
सपना चाहे स्वर्ग छू ले,
पाँव तले पहचान रहे।
यश मिल जाए, पद मिल जाए,
मन में कभी अभिमान न हो।
ऊँचाई के शिखर मिलें पर,
अपनों का अपमान न हो।
धरती संग आकाश जोड़ना,
यही कथा ने समझाया।
धर्म-विधान को लाँघ चला जो,
नभ-मध्य त्रिशंकु कहलाया॥
— संतोष कुमार शर्मा