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घर से आया एक छोटा-सा संदेश

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            शहर की भीड़ में
        
                                                    
                            
एक लड़का रोज़
अपने गाँव को ढूँढ़ता है।

कभी चाय की भाप में,
कभी माँ की आवाज़ में,
कभी शाम के उस सूरज में
जो यहाँ भी डूबता है,
पर गाँव जैसा नहीं लगता।

जेब में कुछ सिक्के हैं,
आँखों में कई सपने,
और फोन की स्क्रीन पर
घर से आया एक छोटा-सा संदेश—

“खाना खा लिया?”

बस इतना पढ़कर
वह कुछ देर चुप हो जाता है।

उसे याद आता है
वो आँगन,
जहाँ शाम होते ही
चारपाई बिछ जाती थी।

वो पिता,
जो कम बोलते थे
मगर जाते वक्त
जेब में चुपचाप पैसे रख देते थे।

वो माँ,
जो हर बार कहती थी—
“जल्दी लौटना।”

लेकिन लौटना इतना आसान कहाँ था।

शहर ने उसे
सपनों का पता तो दिया,
पर सुकून का रास्ता नहीं।

दिन नौकरी की तलाश में बीतता है,
रात भविष्य सोचते हुए।

फिर भी वह चलता है,
क्योंकि उसे मालूम है—

घर से निकले लोग
सिर्फ कमाने नहीं निकलते,
वे अपने पीछे छूटे लोगों के
सपने भी साथ लेकर निकलते हैं।

एक दिन वह जरूर लौटेगा।

शायद हाथ में
एक छोटी-सी सफलता होगी,
शायद आँखों में
थोड़ी और चमक।

और दरवाज़े पर खड़ी माँ
बस इतना पूछेगी—

“थक गए हो?”

वह मुस्कुराकर कहेगा—

“नहीं माँ,
अब घर आ गया हूँ।”
30 मिनट पहले
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