रात सफ़र में सितारों के बीच,
एक चाँद ही तन्हा थोड़े है।
भीड़ बहुत है इस अंबर में,
हर कोई अपना थोड़े है।
रोने को तो रात भी रोई,
ओस की बूँदों के पर्दे में,
सुबह की पहली किरण तलक फिर,
दर्द ये थमता थोड़े है।
दिखती है जो दूर से महफ़िल,
फ़ासले कितने हैं तारों में,
साथ जो चलता दिखता साया,
दर्द समझता थोड़े है।
अपने ही नूर की आग में जलकर,
खुद को मुसाफ़िर करते हैं,
ख़ामोशी की इस बस्ती में,
कोई पुकारता थोड़े है।
'स्पंदन' दिल का समझ सके
जो ‘श्रवण',
कोई तो हमदम ऐसा हो,
यूँ तो जहाँ में राहगुज़र पर,
अकेला रस्ता थोड़े है।