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तुम क्या जानो प्रिय हम कैसे जिया करते हैं।

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ज़िक्र तेरा हर शय से किया करते हैं
        
                                                    
                            
हवाओं से भी तेरी खबर लिया करते हैं
तुम क्या जानो प्रिय हम कैसे जिया करते हैं।

यादों के ऊंचे दरख्तों के
साये में मन के पंछी को
थोड़ी देर सुकूं पाने की
झूठी आस दिया करते हैं
तुम क्या जानो प्रिय हम कैसे जिया करते हैं।

इस नील गगन का असीम विस्तार
मुझ से होता हुआ तुम तक भी है
इस नील गगन में बन पतंग हम
तेरी टोह किया करते हैं
तुम क्या जानो प्रिय हम कैसे जिया करते हैं।

ये फूल जो गुलशन-गुलशन महके
ये भंवरे जो मकरंद से बहके
इन मुस्कुराती फिज़ाओं में पल-पल
तुमको महसूस किया करते हैं
तुम क्या जानो प्रिय हम कैसे जिया करते हैं।

मन गोपी सा हुआ बावरा
सुन लो मेरे श्याम सलोने
जिस राह तुम छोड़ गए थे
अश्रु वहीं पिया करते हैं
तुम क्या जानो प्रिय हम कैसे जिया करते हैं।

 
2 महीने पहले
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