विज्ञापन

शीर्षक। (सवाल)

User

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अगर हर बात पर झुक जाएँ, तो सम्मान होगा क्या?
        
                                                    
                            
जो सच कहना ही छोड़ दें, तो फिर इंसान होगा क्या?

अगर हर मोड़ पर समझौता ही मंज़िल बन गया,
तो फिर उस राह पर चलने का कोई मान होगा क्या?

अगर आईना ही झूठ बोले, तो चेहरा देखना कैसा?
नज़र सच से ही हट जाए, तो फिर पहचान होगा क्या?

अगर रिश्ते ही मतलब से चलें, तो प्यार होगा क्या?
जहाँ सौदा ही सौदा हो, वहाँ परिवार होगा क्या?

अगर हर शख़्स अपनी ही कहानी लिखने लग जाए,
किसी के दर्द को पढ़ने का फिर अरमान होगा क्या?

'राकेश' अपने ज़मीर से कभी समझौता मत करना,
जो ख़ुद की नज़र में गिर गया, उसकी पहचान होगा क्या?
- राकेश कुमार तिवारी 
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all