समय और जीवन
ये समय नहीं बदलता, बदलती जाती उम्र,
चुपचाप बीतता जीवन, रहती न कोई ख़बर।
हम समझते रहे कि वक़्त बदलता जा रहा,
देखते-देखते बीत गया जीवन का सफ़र।
घड़ी की सुइयाँ समय कहाँ बदलती हैं,
ये तो बस साँसों की गिनती करती चलती हैं।
टिक-टिक की सदा जीवन का लेखा सुनाती है,
बीत रहे हर पल की मूक ख़बर दे जाती है।
हर टिक जैसे टूटता जीवन का एक पल,
हर टक से जागती मन में इक हलचल।
कल जो अपना था, आज बेगाना लगता है,
बीता हुआ मौसम फिर याद क्यों आता है।
न मंज़िल दिखाती हैं, न राह बताती हैं,
बस बीते लम्हों की परछाईं दिखाती हैं।
मुट्ठी की रेत-सी उम्र फिसलती जाती है,
देखते-देखते जीवन की ऋतु ढल जाती है।
समय तो ठहरा है अधूरी हसरतों में,
अनकहे ख़्वाबों और अनसुनी चाहतों में।
अनिर्णय के मोड़ों पर जब कदम ठहर जाते हैं,
भीतर के सन्नाटे ख़ुद ही सवाल बन जाते हैं।
बदलने का भरम हमने यूँ ही पाल रखा है,
वक़्त को बाँधने का ख़्वाब सजा रखा है।
ये बेजान काँटे तो बही के मुंशी हैं,
जो दर्ज करें—क्या पाया, क्या खोया, क्या बाकी है।
जीवन को मुट्ठी में बाँध कभी न पाते हैं,
बीते हुए पल फिर लौटकर कब आते हैं।
रोकें जितना, वक़्त उतना दूर निकल जाता है,
छूटा हुआ एक पल फिर हाथ कहाँ आता है।
जब आख़िरी टिक-टिक अँधेरे में खो जाएगी,
दीवार पर टँगी घड़ी बस मौन रह जाएगी।
काँटे गवाही देंगे उस बीती रवानी की,
साँस थम जाएगी, रुक जाएगी बात ज़िंदगानी की।
समय नहीं थमता, घड़ी चलती ही जाएगी,
उम्र की आख़िरी शमा भी चुपचाप बुझ जाएगी।
काँटे गवाही देंगे—कितना जीवन जी पाए,
अधूरी दास्ताँ कह जाएगा भुवन, साँस ठहर जाएगी।
-भुवनेश्वर प्रसाद दीक्षित ‘भुवन’