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सब मिल गया मगर ….

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सब मिल गया मगर …
        
                                                    
                            

माँ ने
वक़्त माँगा।
मैंने हर बार
पैसे भेजे।
दवा आती रही,
मैं नहीं।
जब मैं पहुँचा—
दवा बची थी,
माँ नहीं।

पिता अक्सर
दर तक आते।
मैं जल्दी में
निकल जाता।
आशीष लेने
जब घर लौटा—
छड़ी खड़ी थी,
पिता नहीं।

उसने बस
साथ माँगा।
मैंने पहले
मक़ाम चाहा।
मक़ाम मिला।
जब मैं लौटा—
हाथ वही थे,
मेहँदी नई थी,
नाम मेरा नहीं।

आँगन छोटा था,
हँसी बड़ी थी।
घर बड़ा हुआ,
कमरे बँट गए।
छत वही रही,
पता वही रहा।
मकान ज़िंदा था—
घर मर गया।

बेटा बोला—
“खेलो ना।”
मैंने कहा—
“कल खेलेंगे।”
आज मैं बोला—
“बैठो ना।”
वह मुस्कुराया—
“कल मिलेंगे।”

एक लफ़्ज़
काफ़ी था—
“माफ़ करना।”
कहना भर था।
मैं सही
बना रहा।
अहं बच गया—
अपना चला गया।

रोटी आधी,
हँसी पूरी।
एक थाली,
कई हाथ।
दौलत आई,
थालियाँ बढ़ीं।
भूख मिट गई—
बाँटने वाले नहीं।

उसकी चूड़ियाँ
खनकती थीं।
मैं अक्सर
चिढ़ जाता।
अब घर
ख़ामोश है।
कान तरसते हैं—
वही शोर चाहिए।

त्योहार आया,
दीये जले।
पकवान बने,
कुर्सियाँ सजीं।
फ़ोन भी आए,
सबने कहा—
“अगली बार।”
दीये जलते रहे—
घर बुझ गया।

उम्र भर
कल सँवारा।
आज मगर
टालता रहा।
हाथ भरे थे,
दिल खाली था।
सब मिल गया—
ज़िंदगी नहीं मिली।
-संतोष कुमार शर्मा
2 घंटे पहले
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