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रसोई का रसायन

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ऋषि-प्रज्ञा के अक्षर-अक्षर,
        
                                                    
                            
आज भी जीवन-ज्ञान सुनाते।
रसायन के प्रथम अध्याय में,
वे स्वस्थ रहने की रीति बताते।
रसायन केवल औषध नहीं है,
यह ओज बढ़ाने का पथ होता।
शुद्ध आहार, सुपाच्य निवाला,
फिर तन में पोषण-बीज बोता।
रोग मिटाना लक्ष्य नहीं बस,
तभी रक्षा का दीप जलाया।
पथ्य, प्रकृति, संयम के संग,
चरक ने आरोग्य-मर्म बताया॥

आँवला—जिसे आमलकी कहते,
उसमें प्रकृति का बल समाता।
जब हरड़-बहेड़ा संग मिल जाते,
तब उनका मेल त्रिफला बन जाता।
तीनों फलों का सार सँजोकर,
तब चरक उनके गुण समझाते।
मधु, घी, मिश्री के संग भी,
वे सही मात्रा में मिलाए जाते।
छोटे फल, पर गुण अनगिन हैं,
फिर ऋषि ने गुण-द्वार दिखाया।
पथ्य, प्रकृति, संयम के संग,
चरक ने आरोग्य-मर्म बताया॥

सोंठ, पिप्पली, हल्दी, सेंधा,
ये रसोई की सहज निशानी।
गुड़, मधु, घी सही ढंग से,
तब रचते योगों की कहानी।
तीखे-मीठे हर रस की भी,
अपनी निश्चित सीमा होती।
कब, कितना, किसके संग लेना,
तभी वस्तु हितकारी होती।
सही मात्रा गुण सँभाले,
तब संयम का भाव जगाया।
पथ्य, प्रकृति, संयम के संग,
चरक ने आरोग्य-मर्म बताया॥

दूध, घी और सादा चावल,
ये पोषण के आधार कहाते।
मूँग का हल्का सूप और जौ,
ये पथ्य-सहचर बनते जाते।
ताज़ा भोजन, निर्मल पानी,
इनसे तन में स्फूर्ति छाती।
समय-बद्ध सुपाच्य निवाला,
जिससे पाचन में लय आती।
थाली केवल तृप्ति नहीं है,
तब पोषण-संसार सजाया।
पथ्य, प्रकृति, संयम के संग,
चरक ने आरोग्य-मर्म बताया॥

च्यवन ऋषि की क्षीण काया,
वह नवबल की आशा करती।
आँवला, घी, मधु, वन-औषध,
तब च्यवनप्राश की कथा उभरती।
धीमी आँच पर पकता मिश्रण,
सही समय से रूप सँवारे।
पात्र, आँच, अनुपात, अवधि,
तब उस योग के गुण निखारे।
जल्दी में जीती दुनिया को,
इसने धीरज-पाठ पढ़ाया।
पथ्य, प्रकृति, संयम के संग,
चरक ने आरोग्य-मर्म बताया॥

सत्य-वचन, करुणा और सेवा,
ये मन में शुभ भाव जगाते।
क्रोध-रहित, प्रिय वाणी वाले,
वे जीवन में सुख-शांति पाते।
पूरी नींद, सही जागरण,
ये तन-मन में अनुशासन लाते।
दान, तपस्या, गुरुजन-सेवा,
वे सब अंतर का ओज बढ़ाते।
अच्छे आचरण का यह पथ भी,
वह ‘आचार-रसायन’ कहलाया।
पथ्य, प्रकृति, संयम के संग,
चरक ने आरोग्य-मर्म बताया॥

आज समय की दौड़ बहुत तेज,
इससे भोजन-क्रम छूट रहा है।
कृत्रिम स्वादों के आकर्षण में,
और घर का भोजन रूठ रहा है।
देर रात, तनाव, अधैर्य,
ये पाचन का बल घटाते।
नियम, विश्राम, मित आहार ही,
वे जीवन में लय लौटाते।
रोग उगे तब जागें क्यों हम,
इसीलिए बचने का पथ दिखाया।
पथ्य, प्रकृति, संयम के संग,
चरक ने आरोग्य-मर्म बताया॥

हर देह की भिन्न प्रकृति है,
एक नियम सब पर न चलता।
जो हितकारी एक जन को,
वही दूसरे को उलटा पड़ता।
उम्र, बल, पाचन, रोग-अवस्था,
तभी वैद्य सही राह बताए।
अपने मन से नुस्खे चुनना,
लाभ के बदले हानि कराए।
चरक-दीप आज भी जलता है,
फिर भी काल न उसे बुझा पाया।
पथ्य, प्रकृति, संयम के संग,
चरक ने आरोग्य-मर्म बताया॥
— संतोष कुमार शर्मा
 
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