बरसात अर टपकतो पाणी....
घिर-घिर आवी सावण री घटा, अंबर सूँ अमरत बूँद झरै।
म्हारै कच्चै घर री छत माथै, टप... टप... पाणी गीत करै।
कोणै माटी रो सुर छे ई, कोणै बादळ री बाणी है।
हर इक बूँद म्हारै आँगण री, बचपण री इक निशाणी है।
माँ परात अर घड़लो धरै, बापू हँसतां खाट सरकावै।
टपकती बूँदां री रुनझुण मं, पूरो घर मुस्कातो जावै।
भींजी माटी री सोंधी खुशबू, मन नै घणो हरखावै।
टपकती छत रो ई सुख तो, महलां मं कद मिल पावै?
सावण आवै, सावण जावै, यादां फेर हरी हो जावै।
म्हारै कच्चै घर रो टपकतो पाणी, आज भी मन नै घर बुलावै।