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पुरूषार्थ का प्रादुर्भव और विजय का श्रृंगार

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हाथों में सरसराहट
        
                                                    
                            
कानों में सनसनाहट
होठों पर बुदबुदाहट
क्या ये संयोग मात्र है
या मन में पंक्तियों का
कोई उफान आया है
या तन में नूतन शब्दों का
कोई तूफान आया है
या कोई आपको आपसे मिलाने का संदेश लेकर आया है
या प्रकृति ये संदेश है खुद में पिरोए हुए
आज बहुत दिन हो गए कविता लिखे हुए।

अब लेखनी सजेगी
अब मस्तक थोड़ा उठेगा
ताम्र पत्र पर अब हर अक्षर खिल उठेगा।

अंत होता नहीं कभी
पर प्रारब्ध को सजाने के लिए
अब रण से पहले
अभ्यास में रक्त बहाना होगा।
जो बिना तपे सीधे मंच पर चढ़ जाते हैं,
परिणाम बिगड़ने पर अंत में केवल अश्रु बहाते हैं,
उस खाली पश्चाताप के रुदन से बचने के लिए,
पहले भरसक पसीना बहाना होगा।

तपना होगा धधकती ज्वाला में,
तभी यह संकल्प आकार लेगा।
श्रम की इन पावन बूंदों से ही,
कल का सूरज नया श्रृंगार लेगा।
सुप्त पड़ी जो भाग्य की रेखाएं हैं,
उन्हें पुरुषार्थ से अपने जगाना होगा।
मंज़िल की ज़िद है अगर इतनी,
तो हर तूफ़ान से अब टकराना होगा।
2 महीने पहले
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