मेरा प्रेम न दिखता था, और न ही कोई वृतांत कहानी थी,
वह मेरे भीतर घटते उस सत्य का साक्षी था,
जिसे शब्दों की कभी आवश्यकता नहीं पड़ी।
न उसे कहने की कोई कामना थी,
न उसे दुनिया को दिखाने की आकांक्षा।
क्योंकि जो सत्य होता है,
वह किसी प्रमाण का मोहताज नहीं होता —
वह स्वयं अपना प्रकाश होता है।
मैंने प्रेम को विचार नहीं बनाया,
उसे अपने आचरण में उतारा।
वह मेरे कहने में नहीं,
मेरे होने में रहा।
न वह मेरा था, न तेरा,
न उसे पाने की कोई शर्त थी,
न खो देने का कोई भय।
वह बस था—
जैसे साँस होती है,
जैसे धूप बिना किसी आग्रह के उतरती है,
जैसे नदी बहती है
बिना यह पूछे कि समुद्र उसका होगा या नहीं।
शायद प्रेम का अंतिम सत्य यही है—
उसे पाने वाला कोई नहीं होता,
उसे खोने वाला भी कोई नहीं।
वह बस होता है…
और जब प्रेम सचमुच प्रेम होता है,
तो व्यक्ति चला जाता है,
समय बदल जाता है,
कहानियाँ समाप्त हो जाती हैं—
लेकिन वह भीतर घटा हुआ सत्य
वहीं रहता है।।
- राकेश कुमार तिवारी