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पश्चात्ताप से पंचकेदार तक

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पश्चात्ताप से पंचकेदार तक (पौराणिक गीत)
        
                                                    
                            

अठारह दिन का रण थम गया,
कुरुक्षेत्र शांत पड़ा था,
जीत खड़ी थी द्वार, हृदय में,
गहरा विषाद भरा था।
रक्त-सने संबंधों का ऋण,
अब कैसे उन्हें चुकाना होगा—
आत्मग्लानि में तपना होगा,
तभी शिवत्व को पाना होगा॥

शांत वचन वेदव्यास के,
शिव का मार्ग दिखाते थे,
“कर्मों का फल स्वीकारो तुम,”
धर्म का मर्म बताते थे।
क्षमायाचना शब्द नहीं है,
खुद को सत्य दिखाना होगा—
आत्मग्लानि में तपना होगा,
तभी शिवत्व को पाना होगा॥

राजमुकुट की चमक छोड़कर,
पर्वत-पर्वत चलते थे,
हिम की चादर, कठिन हवाएँ,
पाँचों फिर भी बढ़ते थे।
ईश्वर को जो खोज रहा है,
पहले खुद तक आना होगा—
आत्मग्लानि में तपना होगा,
तभी शिवत्व को पाना होगा॥

बैल का रूप धरे महादेव,
पशु-झुंडों में छिपते थे,
पांडव जब भी निकट पहुँचते,
शिव आगे बढ़ जाते थे।
दर्शन की उस कठिन परीक्षा में,
हर अभिमान झुकाना होगा—
आत्मग्लानि में तपना होगा,
तभी शिवत्व को पाना होगा॥

शिलाओं जैसे पाँव जमाकर,
भीम द्वार बन खड़े हुए,
भूमि में जब दिव्य बैल समाया,
दिशा-दिशा में नाद हुए।
केदारनाथ के कुबड़-रूप पर,
शीश सभी को झुकाना होगा—
आत्मग्लानि में तपना होगा,
तभी शिवत्व को पाना होगा॥

बाहुओं का तेज जहाँ पर,
तुंगनाथ का धाम बना,
शक्ति मिली है सेवा के हित,
जीवन का यह ज्ञान बना।
बल पाकर भी विनम्र रहो तुम,
यह संदेश निभाना होगा—
आत्मग्लानि में तपना होगा,
तभी शिवत्व को पाना होगा॥

मुख प्रकट हुआ चट्टानों में,
रुद्रनाथ का धाम बना,
रौद्र रूप की कठिन छटा में,
करुणा का संदेश बना।
सत्य मुखौटों में कब मिलता—
सच्चा मुख दिखलाना होगा—
आत्मग्लानि में तपना होगा,
तभी शिवत्व को पाना होगा॥

नाभि-मध्य जहाँ प्रकट हुआ,
मध्यमहेश्वर धाम खिला,
जीवन के संतुलित क्रम में,
संयम का शुभ ज्ञान मिला।
इच्छाओं के तेज प्रवाह को,
मर्यादा में लाना होगा—
आत्मग्लानि में तपना होगा,
तभी शिवत्व को पाना होगा॥

जटाएँ जहाँ शिला से निकलीं,
कल्पेश्वर का धाम खिला,
तप की उलझी हर धारा में,
आत्मज्ञान का कमल खिला।
मन की सारी उलझन को भी,
धीरज से सुलझाना होगा—
आत्मग्लानि में तपना होगा,
तभी शिवत्व को पाना होगा॥

केदार कहे—अहंकार तजो,
तुंगनाथ—सेवा अपनाओ,
रुद्रनाथ—सच्चाई चुन लो,
मध्यमहेश्वर—संयम अपनाओ।
कल्पेश्वर की जटा पुकारे—
हर बंधन सुलझाना होगा—
आत्मग्लानि में तपना होगा,
तभी शिवत्व को पाना होगा॥

मंदिर-मंदिर शीश झुकाना,
भक्ति का बस आरंभ है,
भूल मानकर खुद को बदलना,
शिव-पूजन का मर्म है।
पश्चात्ताप तभी है सच्चा,
जब आचरण बदलना होगा—
आत्मग्लानि में तपना होगा,
तभी शिवत्व को पाना होगा॥
— संतोष कुमार शर्मा
 
एक दिन पहले
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