"ये पर्वतों के मौसम, कितने सुहाने लगते हैं.....।
जन्मो के इनसे ' रिश्ते ', कितने पुराने लगते हैं...।
ये पर्वतों के मौसम,कितने सुहाने लगते हैं........।
ये फूलों की वादियाँ, जैसे बीती यहाँ सदियाँ....।
ये गुंज़ार करते भंवरे, कितने दीवाने लगते हैं....।
ये पर्वतों के मौसम, कितने सुहाने लगते हैं......।
ये झरनों के झरोके, रुकते नहीं रोके...।
ये मस्त हवाएँ, रूकती नहीं रोके......,
टकराते इनसे बादल, इनके 'सयाने' लगते हैं.....।
ये पर्वतों के मौसम, कितने सुहाने लगते हैं....।
ये पंक्षियों के कलरव, बहता दरिया का पानी
,
ये किरणों की चितवन, तेरी मेरी प्रेम कहानी..,
ये बहारों के मंज़र, दिल के अफसाने लगते हैं....।
ये पर्वतों के मौसम, कितने सुहाने लगते हैं.......।