हर चमकती चीज़ को सोना समझ बैठा जहाँ,
बस यहीं से ख़ुद फ़रेबों का सफ़र शुरू हुआ।
जिसको देखा ही नहीं दिल की नज़र से एक बार,
उसके हिस्से हर दफ़ा इल्ज़ाम ही बेहतर हुआ।
ऐब अपनों के भी अक्सर लोग ज़ेवर मानते,
ग़ैर का हर एक हुनर भी बेअसर ठहरा हुआ।
ख़रा सोना भी कई दफ़ा धूल में गुम हो गया,
और पीतल ताज पहनकर शहर में मशहूर हुआ।
हर किसी की मुट्ठियों में परख आती ही नहीं,
इसलिए हर जौहरी का फ़ैसला मंज़ूर हुआ।
वक़्त जब उतरा कसौटी बनके रिश्तों के बीच,
जो चमकता था वही अक्सर बहुत बेनूर हुआ।
क़द्र मिलती है वहीं, जहाँ निगाहें साफ़ हों,
वरना हीरा भी यहाँ पत्थर समझकर दूर हुआ।
याद रखना, ऐ मुसाफ़िर, जल्द फ़ैसले मत करना,
ख़रा सोना देर से सही, आख़िर मशहूर हुआ।
नोट :ये मेरी मौलिक ग़ज़ल लेकिन ये मेरे
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