बदल रही हूं हर पल
आधुनिकता के साथ मैं
है थाम के खड़ी हूँ
नए दौर का हाथ मै।
सोच को दिए पंख नए
हर बन्धन को तोड़ दी
पुरानी राह रूढ़ियों की
कब की पीछे छोड़ दी।
बदलती हुई तस्वीर नहीं
मै एक नया इतिहास हूँ
हर सीख से सबक ले
मैं वही विश्वास हूँ।
बदल रही हूँ जीने का
सलीका ज़रूर मैं
अपनो के लिए आदर
है आज भी दिल में।
मैं कल की नींव पर खड़ी
ले कर भविष्य का ख्वाब हूँ
संस्कारों की मिट्टी से
महके जो गुलाब हूं।
बदल गया है वक्त भले
पर मेरा स्वाभिमान वही है
नए गगन को छूकर भी
ज़मीन का सम्मान वही है।
रुकना नहीं झुकना नहीं
यही मेरा पैगाम है
मर्यादा में बंधी उड़ान का ही
आधुनिकता नाम है।
-पायल शर्मा