विज्ञापन

पंछी का आसमान

User

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सामान्य सी लेखिका हूं,
        
                                                    
                            
स्वतंत्रता लिखना भाता है मुझे
कुछ इस प्रकार मानो पिंजरे में बंद कोई पंछी आसमान लिखता हो।
मुझे आसक्ति है पिंजरे से,
कदाचित एकमात्र विकल्प भी यही है कि विवशता को आसक्ति कह दूं।
अम्बर से विरह की पीढ़ा भी क्षीण हो जाएगी,
यदि मैं बेड़ियों को श्रृंगार कह दूं।
पिंजरा जीवन है, अम्बर अस्तित्व,
तो क्या मैं त्याग कर अस्तित्व, मृत्यु को जीवन कह दूं?
मेरा हृदय स्वीकारने लगा है बंधन,
अब आसमान दिखने पर मैं आँखें मूंद लेती हूं।
वो न मुझे करे विवश आँखें खोलने को,
सोचकर मैं अभिनय में कुछ पल ऊंघ लेती हूं।
फिर भी यदि आँखें करती हैं अवहेलना,
वे दुस्साहस करके देखती हैं आसमान,
और ये ढीठ पंख भरने लगते हैं उड़ान,
तब पिंजरा देता है मेरा साथ,
सोने की सलाखों से करता है पंखों को लहुलुहान।
कदाचित किसी दिन मैं चुकाऊंगी पिंजरे का आभार,
त्याग दूंगी पंख, उड़ने की इच्छाएं भी।
टूटे पंखों से बुन लूंगी एक पर्दा,
पर्दे के पार नहीं देखूंगी आसमान।
एक महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Manju Sharma

3565 कविताएं

View Profile