हर उम्र की दहलीज पर, हर ज़ुल्म की दास्ताँ पर,
तुमने कुछ न कुछ कहा, हर बलात्कारी का दामन छुड़ाया।
जब पच्चीस की जवानी लुट गई,
तो तुम उसकी पोशाक पर सवाल उठा गए।
कहकर कि "कपड़े छोटे थे,"
तुमने अपनी मानसिकता को नंगा कर दिया,
और उस पर दो इंच की इज़्ज़त को नीलाम कर दिया।
जब बीस की उम्र में नोच ली गई अस्मत,
तो तुमने उसके चाल-चलन को जज किया।
"लड़की का मिजाज़ ठीक नहीं था,"
यह कहकर तुमने उस पर कीचड़ उछाल दिया,
और उस इंसान के दिल पर वार कर दिया।
जब सोलह की नादान उम्र शिकार हुई,
तो तुमने उसकी शारीरिक बनावट को तराजू पर रखा।
"बनावट से लगती नहीं कि इतनी छोटी है,"
यह कहकर तुमने उसके बचपने को नकार दिया,
और एक पल में उसे औरत करार दिया।
जब तेरह साल की कली रौंदी गई,
तो तुमने कुदरत के नियम को ही कसूरवार ठहरा दिया।
"आजकल लड़कियाँ जल्दी बड़ी हो जाती हैं,"
यह कहकर तुमने अपनी हवस को जायज़ मान लिया,
और बचपन को जवानी से पहले कुचल दिया।
जब तीन साल की बच्ची को दरिंदों ने नहीं बख्शा,
तो तुम माँ-बाप की परवरिश पर कीचड़ उछाल गए।
"माँ-बाप लापरवाह थे,"
यह कहकर तुमने अपनी जिम्मेदारी को नकार दिया,
और मासूमियत को अनाथ छोड़ दिया।
और जब अठारह महीने की गुड़िया भी बेइज्जत हुई,
तो अब भी कोई बहाना बाकी है तुम्हारे पास?
अपनी हैवानियत को, अपनी मर्दानगी के नाम पर,
और कोई नई, कोई और घिनौनी वजह ढूँढ़ोगे क्या?
हर बार तुम जीते, हर बार तुम्हारी दलीलें जीतीं,
और हर बार न्याय हार गया, एक नन्ही परी हार गई, इंसानियत हार गई।
यह एक कड़वा सवाल है,
जिसे यह कविता छोड़ जाती है क्या समाज अभी भी चुप रहेगा?