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मेरी ग़ज़ल के शेर हो अल्फाज़ हो तुम्हीं

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इस ज़िंदगी के ख़्वाब के तो राज़ हो तुम्हीं,
        
                                                    
                            
हर दर्द-ए-बेमिसाल के ईलाज हो तुम्हीं।

हर दौर-ए-ज़ीस्त सिर्फ़ तुम्हारे क़रीब है,
कल था तुम्हारा और मिरे आज हो तुम्हीं।

उलझन की डोर से मुझे कसकर जकड़ लिया,
बस तुमको ख़ुश ही देखना, नाराज़ हो तुम्हीं।

छू लेंगे आसमाँ जो तुम्हारा मिलेगा साथ,
हर इक उड़ान की मेरी परवाज़ हो तुम्हीं।

हुस्न-ओ-जमाल तुमसे ही लेता रहा उधार,
हर हुस्न-ओ-इश्क़ से जुदा अंदाज़ हो तुम्हीं।

तुम आफ़ताब हो मेरे, तुम ही हो माहताब,
मेरी हयात-ए-इश्क़ का आग़ाज़ हो तुम्हीं।

तहज़ीब 'अब्र' की हो, हो अंदाज़-ए-गुफ़्तगू,
मेरी ग़ज़ल के शे'र हो, अलफ़ाज़ हो तुम्हीं।
-अब्र_लखनवी
एक महीने पहले
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