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मेघ मल्हार

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अंबर के आँगन में देखो, घन-घमण्ड का प्रादुर्भाव।
        
                                                    
                            
सर्द हवाएँ सहसा लाती, मलय पवन का नव अनुभाव।।
तीखी फुहारें तीर चलाती, तप्त वसुंधरा तर तन वसन।
सरि सरिता की दीर्घ त्रिषा, आकुल व्याकुल सारे वन।।

सिक्त वसना कामिनियों के, हास विलास बिखरते जाएँ।
मुस्कुराती सखियों की चंचल, भौंहें मदन-चाप चलाएँ।।
संगीत सुहावन गाती बूंदे, छप छप के झंकृत स्वर हैं।
उमड़ घुमड़ कर आतुर बादल, नभ प्रांगण के कुंजर हैं।।

पल्लव वल्लरी करती नर्तन, तरुण तरु भी कहाॅं कम है।
लुका छिपी करती चपलाएँ, शीतल पवन भी असि सम है।।
ओझल होता ओजस भास्कर, घनघोर घटाए अमृत सागर।
रिमझिम रिमझिम बूँद ताल पर, नृत्यरत मन वर्षा गागर।।

नव अंकुर सब विटप सुंदर, किसलय की छटा अनूप।
सप्तवर्ण का इंद्रधनुष यह, अंबर में मुकुटेश्वर रूप।।
दादुर मोर पपीहा गाते, मधुर मिलन के मंगल गीत।
विरही जनों का विह्वल हिय, सुंदर सावन, रमण रीत।।
—जितेन्द्र सिंह राणावत
2 महीने पहले
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