प्रेम स्वार्थ नहीं समर्पण है।
खुद को ख़ुद से देखने का दर्पण है।।
जहां दो दिलों का नहीं दो आत्माओं का मिलन होता है।
जहां मैं पर नहीं सिर्फ हम पर फोकस होता है।।
प्रेम में गिरा दिल खुद के लिए नहीं प्रिय लिए बेकरार होता है।
जहां एक की खुशी ही दोनों की खुशियों का इज़हार होता है।।
जहां कोई नियम या शर्त नहीं सिर्फ विश्वास ही जीवन का आधार होता है।।
कभी किसी की ना सुनने वाला इन्सान प्रिय की हर बात सुनने का तलबदार होता है।।
प्रेम सिर्फ पाने का नाम नहीं बल्कि निभाने का अभिमान होता है।
प्रेम तो सब कर लेते है पर प्रेम को समझना कहा सरेआम होता है।।