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मन की आहुति

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब भी करते हो तुम मुझसे किंचित सी दूरी,
        
                                                    
                            
या अकारण ही ठान लेते हो कोई बैर।
तुम अपना प्रखर क्रोध दिखाते हो,
और मैं... शांत सा, क्लांत सा,
अंतर्मन में मुस्कुराकर,
देता हूँ एक आहुति...
मन की आहुति।

जब आत्मीय जन ही बेध जाते हैं मर्मस्थल वाक्-बाणों से,
और क्षुब्ध हृदय विद्रोह करना चाहता है अपने ही प्राणों से।
तब निज स्वत्व और गरिमा को अक्षुण्ण रखने की लालसा में,
वैमनस्य के विष को पीकर, उस पावन प्रेम की पिपासा में,
देता हूँ एक आहुति...
मन की आहुति।

यह जगत् जब लुभाता है अपनी लौकिक मृगतृष्णाओं से,
और मस्तिष्क घिरने लगता है मिथ्या दंभ की वंचनाओं से।
तब ज्ञान और वैराग्य की समिधा लिए अपने हाथों में,
स्वयं के अहंकार को भस्म करने, इन नीरव रातों में,
देता हूँ एक आहुति...
मन की आहुति।

मेरा यह मौन कोई नैराश्य या विवशता का क्रंदन नहीं,
यह तो चेतना के उत्कर्ष का है एक प्रगल्भ स्पंदन।
मैं तो बस तुम्हारे भीतर छिपे सत्य का मौन जानकार हूँ,
स्वयं को तपाकर कुंदन सा, परमतत्त्व में विलीन हो जाने को,
देता हूँ एक आहुति...
मन की आहुति।
- शीतांशु शेखर द्विवेदी
2 महीने पहले
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