मैं समय की शिष्या हूँ।
मैं समय की शिष्या हूँ…
हाँ… मैं समय की शिष्या हूँ।
हर पल उससे कुछ सीखा है,
हर ठोकर ने मुझे सँवारा है।
धूप ने चलना सिखाया,
छाँव ने ठहरना सिखाया है।
रिश्तों ने भी पाठ पढ़ाए,
कुछ अपने होकर दूर हुए।
कुछ अनजाने साथ निभा गए,
कुछ आईने भी चूर हुए।
अब शिकायतों का समय नहीं,
स्वीकार करना सीख लिया है।
हर गिरने के बाद स्वयं ही,
फिर से उठना सीख लिया है।
चेहरे की हर रेखा अब
उम्र नहीं… अनुभव का हस्ताक्षर है।
क्योंकि सोना अग्नि में तपकर कुंदन बनता है,
और मनुष्य संघर्षों में तपकर व्यक्तित्व गढ़ता है।
मैं पूर्ण होने का दावा नहीं करती…
मैं हर दिन अपने ही कल से बेहतर बनने की
एक छोटी-सी कोशिश हूँ।
क्योंकि…
मैं समय की शिष्या हूँ…
और अभी सीखना बाकी है।
-प्रतिमा तिवारी