कर्ण तभी तो कर्ण कहलाया
सूर्य-पुत्र बन जन्म लिया था,
माँ का आँचल मिल न पाया,
जन्म मिला था राजकुल में पर,
नदी की धारा में बहाया।
अधिरथ ने जब उसे उठाया,
राधा ने फिर गले लगाया,
रक्त नहीं था दोनों का फिर भी,
ममता का संसार बसाया।
बचपन से ही तेज प्रखर था,
ऊँचा अपना लक्ष्य बनाया,
पर जब-जब प्रतिभा आगे आई,
“सूत-पुत्र” कह उसे गिराया।
परशुराम से विद्या पाई,
अस्त्र-शस्त्र का ज्ञान मिला,
कठिन साधना, कठिन तपस्या,
वीरों में सम्मान मिला।
राजसभा में अर्जुन के सम,
उसने अपना शौर्य दिखाया,
वंश पूछा तो सभा ने फिर से,
उसका गौरव धूल मिलाया।
सबने जब मुँह फेर लिया था,
दुर्योधन ने हाथ बढ़ाया,
अंगदेश का राजमुकुट दे,
उसको उसका मान दिलाया।
जिसने अपमानों के क्षण में,
मित्र बनाकर मान बढ़ाया,
सारी दुनिया छूटे फिर भी,
कर्ण उसे कैसे ठुकराया?
युद्ध निकट था, कृष्ण मिले तब,
जन्म का सारा भेद बताया,
“ज्येष्ठ पांडव तुम हो कर्ण,”
राजसिंहासन भी दिखलाया।
जीवन भर जिस माँ को तरसा,
वही कुंती सम्मुख आई,
अपने छोटे भाइयों की जब,
सच्ची पहचान बतलाई।
माँ भी अपनी, भाई अपने,
मन ने कैसा दर्द उठाया,
एक तरफ़ था रक्त पुकारे,
एक तरफ़ था वचन निभाया।
जान रहा था धर्म किधर है,
जान रहा किस ओर लड़ाई,
जान रहा था हार मिलेगी,
फिर भी मित्रता नहीं भुलाई।
माँ के आँसू देखे उसने,
उसका भी सम्मान बचाया,
“पाँच पुत्र ही रहेंगे तेरे”—
कहकर अपना वचन निभाया।
जन्मजात कवच-कुण्डल थे जो,
जीवन की मजबूत निशानी,
इंद्र माँगने याचक बन आए,
दान कर दी अपनी निशानी।
जान रहा था कवच गया तो,
मृत्यु का पथ और निकट आया,
दानवीर के द्वार से फिर भी,
कोई याचक लौट न पाया।
कर्ण सही था हर निर्णय में—
यह कहना भी उचित नहीं है,
मित्र निभाना धर्म था उसका,
मित्र का हर पथ धर्म नहीं है।
यही कर्ण की पीड़ा भी थी,
सत्य हृदय ने खूब पहचाना,
जीत सरल थी पक्ष बदलकर,
पर उसको स्वीकार न माना।
माँ मिली, भाई भी मिले थे,
राजमुकुट भी पास में आया,
चुन सकता था सहज विजय को,
फिर भी मित्र का साथ निभाया।
जीवन हारा, वचन न हारा,
मित्र का अंतिम साथ निभाया,
रक्त से बढ़कर वचन निभाया,
कर्ण तभी तो कर्ण कहलाया॥
— संतोष कुमार शर्मा