जीवन का शिल्पी तू ही, पत्थर तराशता है
गिरकर फिर उठता है, सपनों को सजाता है ।
हर घाव में छिपा सबक, हर हार में हुनर
टूटकर भी बनाता, नया एक मंजर ।
समय की हथौड़ी चले, धैर्य की छेनी चले
आँसू भी रंग बनें, मेहनत में ढले ।
कोई समझे ना समझे, तू राह बनाता चल
अंधेरे में भी दीपक, खुद ही जलाता चल।
मंजिल नहीं मिलती तो, नक्शा नया खींच
काँटों में भी फूल के, बीज को तू सींच ।
जीवन का शिल्पी वही, जो खुद को गढ़ ले
तूफानों से लड़कर भी, हौसला न मढ़ ले ।
एक दिन दुनिया कहेगी, ये कृति बेमिसाल
क्योंकि शिल्पी ने अपने, हाथों से लिखा कमाल ।।
- सुखमंगल सिंह वाराणसी