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हिसाब उजाले का

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हर कोई सूरज नहीं होता,
        
                                                    
                            
कुछ लोग दीपक भी होते हैं—
ख़ुद थोड़ा-सा जलकर
किसी और की रात कम कर देते हैं।

अजीब है न,
जो दूसरों के रास्ते सँवारते हैं,
कभी-कभी उन्हीं के क़दमों में
सबसे ज़्यादा काँटे मिलते हैं।

कुछ चेहरे बहुत रोशन दिखते हैं,
मगर रोशनी और चमक में
फ़र्क़ होता है—
चमक आँखों को भरमाती है,
उजाला रास्ता दिखाता है।

वक़्त किसी का पक्ष नहीं लेता,
बस अपनी ख़ामोश किताब में
सबके हिस्से की कहानी लिखता जाता है।
आज जो बात छिपी है,
कल वही किसी पन्ने पर
ख़ुद-ब-ख़ुद पढ़ी जाएगी।

इसलिए मुझे अब
अपने उजाले का हिसाब नहीं रखना—
किसने देखा, किसने नहीं देखा,
किसने सराहा, किसने ठुकराया।

जिन्हें ख़ुद जलकर भी उजाला बाँटना आया,
उन्हें रात ने भी कभी अकेला नहीं पाया।

और शायद यही काफ़ी है—
कि जाते-जाते
हमारे हिस्से की रोशनी
किसी और की राह में रह जाए।

क्योंकि आख़िर में
नाम नहीं, शोर नहीं,
बस वही कर्म बचते हैं
जो किसी के अँधेरे में
चुपचाप उजाला बन गए।
— साक्षी यादव
2 महीने पहले
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