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हे वागीश्वरी! विनती स्वीकार करो

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                            हे वाग्देवी!
        
                                                    
                            
इस क्षीण काया में, अनंत की प्रतिध्वनि का गान है।
तुम्हारी शरण में अनुनय है, चेतना का आह्वान है।

शून्य के गर्भगृह से प्रसूत,
ज्ञान ज्योति की संरक्षिका,
विनती स्वीकार करो।

तुम,
अक्षर-ब्रह्म की अधिष्ठात्री,
शब्दों के अनंत नभ में,
विद्युल्लता सी कौंधती,
मौन की मर्मज्ञ हो।

माँ वीणापाणी!
तुम्हारे कर-कमलों में,
ब्रह्मांड का स्पंदन है।
वीणा के तारों के कंपन से,
तुम रचती हो
सृजन के महाकाव्य,
जहाँ तर्कों की सीमाएँ विलीन हो जाती हैं।

हे विद्यादायिनी!
मेरे विवेक के क्षितिज पर,
परम प्रज्ञा का प्रकाश डाल दो,
तिमिरयुक्त जड़ता भंजन का
मुक्ति मंत्र प्रदायनी माँ
जीवन आलोकित करो।

मेरे मस्तिष्क के तंतुओं में,
पवित्र विचारों की निर्झरिणी बहे।
विचार प्रत्येक आता जाता
सत्य के धरातल पर अंकुरित रहे।
बुद्धि सदैव प्रपंचों से परे,
परमार्थ का बोध बन जाए।
सब संकट क्षण में मिटे
तेरी कृपा जब हो जाए।

मैं अज्ञान की परतों में लिपटा,
एक मूक प्रश्न हूँ माँ,
तुम संवेदना के चरम उत्कर्ष पर,
जहाँ मौन भी
परम उत्तर बन जाता है।

हे सुरवंदिता!
मेरे अंतस की वीणा में,
राग-द्वेष के तार ढीले कर,
सत्य, शिव और सुंदर का
नूतन स्वर संधान कर।

हे महाश्वेता!
मेरे भीतर
स्वयं को ही प्रतिष्ठित कर।
हृदय निकुंज में
ज्ञानदीप स्थित कर।

हे ज्ञानदा!
शब्द भंडार सुशोभित कर,
परहित सेवाभाव से
मन मस्तिष्क प्रफुल्लित कर,
दे शक्ति साहित्य सृजन की।
हो अक्षर अक्षर शुद्ध भावना,
हो सर्वमंगल की विशुद्ध कामना।
हे वागीश्वरी! विनती स्वीकार करो।
—जितेन्द्र सिंह राणावत
3 महीने पहले
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