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हर युग में नारी की परीक्षा

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हर युग में नारी की परीक्षा
        
                                                    
                            

किस युग की मैं बात कहूँ,
रचा षड्यंत्र हर युग के साथ।
कभी लिखी गई रामायण,
तो कभी गीता बनी ज्ञान का सार।

लोग दिन-रात जपते प्रभु का नाम,
माँगते अच्छे-बुरे हर कर्म में साथ।
जो राम बनकर रहे प्रजा के साथ,
वही श्याम जाने कितने रचाए रास।

थी नारी की परीक्षा हर युग के हाथ,
अहिल्या शापित हुई, बनी पत्थर समान,
तो सीता तपती रही अग्नि के साथ।

जहाँ दर्शन की प्यासी मीरा
छोड़ गई शोहरत का सारा संसार,
वहीं राधा प्रेम में डूबी रही,
कृष्ण के नाम के साथ।

जहाँ अभिमन्यु ने गर्भ में
सीख लिया युद्ध का ज्ञान,
वहीं द्रौपदी को भरी सभा में
न मिला किसी का साथ।

बड़े-बड़े इतिहास बने नारी से,
नारी ने हर युग को दी नई पहचान,
पर जब फँसी स्वयं नारी संकट में,
क्यों न मिला उसे किसी का साथ?

हर युग ने नारी से त्याग माँगा,
हर युग ने ली उसकी परीक्षा,
फिर भी इतिहास गवाह है—
नारी ने ही रचा हर युग का इतिहास।
एक महीने पहले
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