हाथ में लकीर प्यार का
बहुत गुरुर था,अपने सलीका इज़हार -ए-इश्क का।
आजमाया हर पैंतरा उनके मुहब्बत के अंगीकार का।
कोशिश की बहुत,पर हर बार नाकामी हाथ लगी। टूटा गुरुर,काफूर हुआ सर से नशा-ए- मुहब्बत का, समझ में आया तब बात यही,कही किसी ने सही।
नहीं होता सबके हाथों में लकीर इश्क और प्यार का।
-श्याम कुमार "सागर