वो द्वापर का चक्रव्यूह था, ये कलियुग की माया है,
तब कौरव सम्मुख खड़े थे, अब अपनों की ही छाया है।
हाथ में धनुष-बाण नहीं, ससुराल जंग का मैदान नही।
आज की इस नारी ने, हर द्वार को ललकारा है।
शिक्षा की कोख से हमने भी, कुछ मंत्र सीखे हैं ,
पर गृहस्थी के इस चक्रव्यूह के, घेरे बहुत ही तीखे हैं ।
पहला द्वार 'मर्यादा' का, जो रस्मों ने खींचा है,
दुख को पीकर हमने , इस घर (ससुराल )के बाग को सींचा है।
दूसरा द्वार 'अपेक्षा' का, जो अपनों ने ही बनाया है,
थक कर भी हम मुस्कुराए , बस यही मेरी काया है।
तीसरा, चौथा, पाँचवा द्वार, रोज़ फतह ही करती हु ,
नौकरी, चूल्हा और बच्चे, हर किरदार में ढलती हु ।
छठा द्वार 'स्वयं' का है, जहाँ खुद को भूल जाती हु,
औरों की थाली भरते-भरते, अपनी भूख दबाती हु ।
आधुनिक युग की अभिमन्यु हु , जो भीतर-बाहर लड़ती हु ,
बिन सारथी के रथ पर चढ़कर, हर रोज़ शिखर पर चढ़ती हु।
अपनो के साजिश मे मै हर रोज पिसती हु सास के साजिश कमयाब हो जाता है,
जब पति के नज़र मे गिरती हु हजारों तने सुन कर जब पति से लड़ती हु
सातवें द्वार पर खड़ी है , जहाँ 'निर्णय' का अधिकार नहीं,
अब निर्णय का अधिकार भी लूंगी,
मैं अबला नहीं, अब अपनी पहचान का आकार भी लूंगी।
भले साज़िशें घेरे मुझे, या सास- नंदन के तीखे बाण चलें,
पर सत्य की इस राह पर, अब मेरे भी स्वाभिमान पलें।
अभिमन्यु हूँ मैं आज की, जो अंत तक लड़ना जानती हु ,
गिरे जो पति की नज़र में, मै खुद को तो पहचानती हु ।
बिना सारथी के इस रण में, मैं खुद अपनी मशाल बनूँगी,
बहुत सुन चुके सबकी अब अपने मन के करुँगी s
चक्रव्यूह तोड़कर इस बार, मैं खुद ही अपनी मिसाल बनूँगी।"