विज्ञापन

ग़ज़ल ( ग़म - ए - इश्क़ )

User

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ग़म - ए - इश्क़ बर्बाद करता रहा
        
                                                    
                            
मैं जीता रहा और मरता रहा
बहुत कड़वी सच्चाई है रहने दो
कि नश्तर सा दिल में उतरता है
मैं ख़ुद से ख़फ़ा और ख़ुद से जुदा
सो अपने किए से मुकरता रहा
कोई काम मैं ने किया ही नहीं
कोई जाम आंखों से भरता रहा
मैं गाते हुए अपनी तन्हाइयां
तुम्हारी गली से गुज़रता रहा
कहां से मैं लौटा कहां था गया
कोई दर्द बनकर उभरता रहा
मेरे आगे दर्पण ने रखे हैं ख़्वाब
मेरे पीछे कोई संवरता रहा
मैं अपनी कही याद रखता नहीं
वो किस बात पे ग़ौर करता रहा
कोई बात पूरी नहीं हो सकी
किसी बात से 'रंग' डरता रहा
3 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all