विज्ञापन

तुम क्या फिर कुछ बोले 'रंग'

User

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जी बहलाना होता है
        
                                                    
                            
और ज़िन्दगी में क्या है
अपना कौन पराया कौन
मानो दुनिया धोखा है
किससे कैसी बात करो
सब सब कोई जानता है
मैं अंजान ज़माने से
तुम ने क्या कुछ पूछा है
याद नहीं रहता कुछ भी
भूल भी जाना पड़ता है
जहां ज़िन्दगी ले जाए
मौत तलक ये सपना है
कौन करे किसकी परवाह
कोई किसी का कुछ क्या है
तन्हाई ही है जिसमें
मिलने वाला मिलता है
तुम क्या फिर कुछ बोले 'रंग'
कोई कुछ नहीं समझा है
- मृदुल
एक महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Manju Sharma

3561 कविताएं

View Profile