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अब ज़हर कौन सा उठाया है

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आज का दिन भी रात लाया है
        
                                                    
                            
ये भी मेहमान बन के आया है
ख़्वाब होंगे तमाम झोले में
बहरहाल वक़्त का ही साया है
मैं किसी के लिए तो रुक जाऊं
सब्र अपना है सुख पराया है
क्यों कहीं भी क़रार आए नहीं
आज सीने में क्या जलाया है
ज़िन्दगी से अगर जफ़ा की तो
ज़िन्दगी ने ये आज़माया है
मेरी हर सांस इक गवाही है
आंसुओं ने ज़ुबां को पाया है
किसकी हसरत में जान दे बैठूं
जान - ए - जां को नहीं ये भाया है
हम मुकद्दर तो अपना ख़ुद हैं ही
कब उठाया है, क्या गिराया है
'रंग' तुम अपनी सी कर के मानो
अब ज़हर कौन सा उठाया है
2 महीने पहले
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