आज का दिन भी रात लाया है
ये भी मेहमान बन के आया है
ख़्वाब होंगे तमाम झोले में
बहरहाल वक़्त का ही साया है
मैं किसी के लिए तो रुक जाऊं
सब्र अपना है सुख पराया है
क्यों कहीं भी क़रार आए नहीं
आज सीने में क्या जलाया है
ज़िन्दगी से अगर जफ़ा की तो
ज़िन्दगी ने ये आज़माया है
मेरी हर सांस इक गवाही है
आंसुओं ने ज़ुबां को पाया है
किसकी हसरत में जान दे बैठूं
जान - ए - जां को नहीं ये भाया है
हम मुकद्दर तो अपना ख़ुद हैं ही
कब उठाया है, क्या गिराया है
'रंग' तुम अपनी सी कर के मानो
अब ज़हर कौन सा उठाया है
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