धरा के आँगन का मुखिया है यह,
और इसी माटी का सबसे छोटा बच्चा भी है।
जैसे माँ के गर्भ में एक बीज पनपता है धीरे से,
वैसे ही इस धरती की गोद में संवरता है यह।
हमसफ़र है हमारा, हमारे साथ बड़ा होता है,
धूप-छाँव के हर मौसम में साथ खड़ा होता है।
जब तप्त दुपहरी ज़िन्दगी को झुलसाने लगती है,
तब घनी छाँव बनकर यही हमारा सहारा होता है।
आँधी-तूफ़ान जब डराने आएं इस जहाँ को,
तब ढाल बनकर सीना ताने यही खड़ा होता है।
और जब वक़्त की लहरों में सब डूबने लगे,
बहते पानी में अगर मिल जाए एक टुकड़ा भी इसका,
तो डूबती हुई साँसों को भी यह पल में तार देता है।
कभी नीम, कभी बाबुल, तो कभी तुलसी बनकर,
यह हकीम की तरह हमारे घावों को भरता है।
हमारी रगों में बहती हुई साँसों का पहरेदार,
यह चुपचाप हमारी बलाएँ अपने सर लेता है।
और जब ज़रूरत हो एक साए की, एक तसल्ली की,
तो घर के बुज़ुर्गों सा गंभीर हो जाता है।
बरगद की जटाओं, पीपल की छाँव और खेजड़ी की तरह,
यह हमारे सिर पर दुआओं का हाथ बन जाता है।
इसने कभी झुकना नहीं, बस डटना सीखा है,
तूफानों की आँख में आँख डाल कर हंसना सीखा है।
हमें भी सिखाता है यह हर मुश्किल से लड़ जाना,
जड़ें ज़मीन में गहरी रख, आसमान को छू जाना।
यह सिर्फ एक पेड़ नहीं, हमारा अक्स है,
धरा का सबसे पवित्र और सच्चा शक्स है
-दीपिका रावल