एकलव्य — जिसे कोई रोक न पाया
वन की मिट्टी में जन्मा था,
आँखों में अरमान लिए।
धनुष उठाकर निकल पड़ा वह,
मन में ऊँची उड़ान लिए॥
द्रोणाचार्य के द्वार पहुँचकर,
मन में लेकर आस अपार।
हाथ जोड़कर ज्ञान था माँगा,
पर बंद मिला शिक्षा-द्वार॥
लौट चला वह सूने वन में,
पर मन ने ना हार स्वीकारा।
जिस चौखट से ज्ञान न पाया,
संकल्पों ने दिया सहारा॥
माटी से गुरु-मूर्ति बनाई,
श्रद्धा को आकार मिला।
वन को अपना गुरुकुल माना,
अभ्यासों का संसार मिला॥
भोर हुई तो धनुष सँभाला,
लक्ष्य सामने रोज़ सजाया।
तीर जहाँ भी राह से भटका,
भूल ने अगला पाठ पढ़ाया॥
न राजमहल की छाँव मिली थी,
न साधन थे उसके पास।
श्रम को उसने गुरु बनाया,
साधना बनी उसकी आस॥
दिन-दिन तीर सँवरते जाते,
दूर तलक होने लगी पहचान।
जिसे गुरुकुल सीख न दे पाया,
श्रम ने दिया उसे सम्मान॥
प्रतिभा की जब गूँज उठी तो,
सबके मन में प्रश्न उठा—
बिन राजाश्रय, बिन गुरुकुल के,
कैसे इतना श्रेष्ठ हुआ?॥
द्रोण खड़े थे सम्मुख उसके,
एकलव्य ने शीश झुकाया।
माटी की प्रतिमा दिखलाकर,
अपना गुरु उनको बतलाया॥
गुरुदक्षिणा माँगी गुरु ने,
दायाँ अँगूठा माँग लिया।
क्षण भर भी संकल्प न डोला,
हँसकर अपना अंग दिया॥
अँगूठा गिरा धरा के ऊपर,
पर साहस कब गिर पाया?
हाथ अधूरा हुआ भले ही,
संकल्प कौन छीन पाया?॥
सोचा होगा अँगूठा लेकर,
उसका कौशल थम जाएगा।
जिसने अपनी राह बनाई,
वह कब राह से हट जाएगा?॥
राजपुत्र को गुरु भी मिलते,
साधन, अवसर, मान अपार।
वनपुत्र ने श्रम से पाया,
अपने कौशल का अधिकार॥
पर एकलव्य की गाथा केवल,
अँगूठे का बलिदान नहीं।
यह उस अडिग साधना की कथा,
जिसका कोई अवसान नहीं॥
जिसे न अवसर मिला समय से,
उसने अवसर स्वयं बनाया।
जिसे बनी-बनाई राह न मिली,
उसने अपना पथ अपनाया॥
न राजमहल प्रतिभा गढ़ता,
न गुरुकुल पहचान बनाता।
जिसके भीतर संकल्प जगे,
श्रम उसको शिखर चढ़ाता॥
साधन कम हों, राह कठिन हो,
संकल्पों की ज्योत जलाना।
एकलव्य यह कह गया जग से—
अपनी प्रतिभा स्वयं जगाना॥
— संतोष कुमार शर्मा